Thursday, May 17, 2018

भरत का कैकेयी को कड़ी फटकर देना




श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्


चतुः सप्ततितमः सर्गः

भरत का कैकेयी को कड़ी फटकर देना

इस प्रकार कर निंदा माँ की, रोषावेश में भरत भर गये
माँ नहीं तू शत्रु है मेरी, फिर कठोर वाणी में बोले

क्रूर हृदया हो भ्रष्ट राज्य से, धर्म ने त्याग किया तेरा
रोना नहीं अब मृत राजा हित, मरा जान मुझे अब रोना

राजा तथा राम ने आखिर, क्या तेरा अनुपकार किया था
एक साथ ही उन दोनों को, पड़ा मृत्यु व वनवास भोगना

कारण बनी कुल विनाश का, भ्रूण हत्या का पाप लगेगा
इसीलिए नरक में जा तू, लोक पिता का नहीं मिलेगा

वन भेजकर प्रिय राम को, जो ऐसा बड़ा पाप किया है
तेरे उस घोर कर्म ने, मेरे हित भी भय खड़ा किया है 

तेरे कारण पिता मरे हैं, वन का आश्रय लिया राम ने
अपयश का भागी बनाया, मुझे भी तूने जीव जगत में

मुझसे बात नहीं अब करना, दुराचारिणी, पतिघातिनी
राज्य के लोभ में पड़कर, अति क्रूर कर्म को करने वाली

कौसल्या, सुमित्रा आदि को, दुःख  महान दिया है तूने
अश्वपति की नहीं तू कन्या,  उत्पन्न है राक्षसी कुल में

तेरा पाप मुझमें आया है, हो गया हूँ पिता हीन मैं
अप्रिय बना समस्त जगती का, बिछुड़ गया दो भाइयों से

किस लोक में जाएगी अब तू, राम पिता तुल्य हैं मेरे
जितेन्द्रिय, सभी के बन्धु, रूप यह उनका क्या तू ना जाने

माँ के अंग-प्रत्यंग, हृदय से, पुत्र जन्म हुआ करता
अन्य बंधु प्रिय होते हैं, सर्वाधिक पुत्र प्रिय होता है

Friday, April 27, 2018

भरत का कैकेयी को धिक्कारना और उसके प्रति महान रोष प्रकट करना


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्

 त्रिसप्ततितमः सर्गः

भरत का कैकेयी को धिक्कारना और उसके प्रति महान रोष प्रकट करना 

राम यदि तुझे माँ न मानते, झट तेरा त्याग किया होता 
कलुषित बुद्धि सदा निंदित है, तूने उसे कहाँ से पाया 

बड़ा पुत्र राज्याधिकारी, अन्य सभी सेवक ही होते 
राजधर्म तू नहीं जानती, कानून सदा एक से होते 

इक्ष्वाकु वंश में इसी का, सदा ही पालन होता आया 
केकय के राज में जन्मी तू, बुद्धिमोह कहाँ से पाया 

पापपूर्ण विचार है तेरा, कदापि नहीं पूर्ण करूंगा 
नींव डाल दी उस विपदा की, प्राण भी ले सकती जो मेरा

ले, अप्रिय करूंगा तेरा, वन से राम को लौटाकर 
स्वजनों के प्रिय श्रीराम का, सदा रहूँगा सेवक बनकर 

ऐसा कह भरत ने दुखी हो, कैकयी को फिर फटकारा 
मन्दराचल की गुफा में बैठ, सिंह ज्यों कोई गरज रहा 

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में तिहत्तरवाँ सर्ग 
पूरा हुआ.


Wednesday, March 14, 2018

भरत का कैकेयी को धिक्कारना और उसके प्रति महान रोष प्रकट करना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अयोध्याकाण्डम्
त्रिसप्ततितमः सर्गः

भरत का कैकेयी को धिक्कारना और उसके प्रति महान रोष प्रकट करना

पिता हुए परलोकवासी सुन, वनवास भाई का सुनकर
भरत अति संतप्त हो उठे, व्यक्त किया दुःख वचन यह कहकर

हाय ! मुझे मार ही डाला, बिछड़ा पिता से सदा के लिए
विलग किया गया मैं अभागा, पिता समान बड़े भ्राता से

क्या करना है लेकर यह राज्य, डूब रहा हूँ मैं शोक में
राजा मृतक, भाई वनवासी, दुःख पर दुःख दिया है तूने

घावों पर नमक सा छिड़का, कुल के विनाश हेतु तू आई
ज्यों अंगारा हो दहकता, लेकिन पिता को समझ न आई

कुल कलंकिनी, अरी पापिनी, तूने उन्हें मृत्यु दे डाली
मोह वश छीना सुख कुल का, पिता थे मेरे महा यशस्वी

क्यों विनाश किया है उनका, क्यों बड़े भाई को वन भेजा
 माँ कौसल्या, सुमित्रा का अब, कठिन है जीवित भी रहना

धर्मात्मा हैं राम अति ही, सदाचरण की रीत जानते
जैसा माँ से करना उचित, व्यवहार वह तुझसे भी करते

कौसल्या माँ दूरदर्शिनी, बहन समान ही तुझे मानतीं
उनके पुत्र को भेज तू वन में, फिर भी शोक नहीं जानती 

श्रीराम नहीं दोष देखते,  महायशस्वी शूरवीर हैं
वल्कल वस्त्र उन्हें पहनाकर, कैसा लाभ भला तू देखे  

तू लोभिन है इसीलिए, रामप्रति मेरा भाव न देखे
यह महा अनर्थ कर डाला, राज्य के लिए  तभी तो तूने

कैसे रक्षा कर सकता हूँ, बिन राम-लक्ष्मण के अकेला
पिता भी लें आश्रय उन्हीं का, पर्वत वन का जैसे लेता

किस बल से धारण कर सकता, महाधुरंधर धरता जिसको 
बैलों से जो ढोया जाये, बछड़ा कैसे ढोए उसको

यदि उपाय और बुद्धि से, शक्ति हो मुझमें भरण-पोषण की
राज्य पुत्र के लिए चाहती, इच्छा पूर्ण न होगी तेरी


Saturday, February 10, 2018

कैकेयी द्वारा भरत का श्रीराम के वनगमन के वृत्तांत से अवगत होना


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्




द्विसप्ततितमः सर्गः


भरत का कैकेयी के भवन में जाकर उसे प्रणाम करना, उसके द्वारा पिताके परलोकवास का समाचार पा दुखी हो विलाप करना तथा श्रीराम के विषय में पूछने पर कैकेयी द्वारा उनका श्रीराम के वनगमन के वृत्तांत से अवगत होना 



नहीं हरा है धन ब्राह्मण का, धनी या निर्धन नहीं मारा
परस्त्री पर नजर न डालें, कारण अन्य है वन जाने का

होने वाला राज्याभिषेक,  श्रीराम का सुना मैंने
उनके हित माँगा वनवास, ले लिया राज्य तुम्हारे हित में

सत्यप्रतिज्ञ स्वभाव के कारण, पूर्ण पिता ने की माँगें
लक्ष्मणऔर सीता के साथ, श्रीराम वन को भेजे गये

पुत्रशोक से पीड़ित होकर, महाराज ने त्यागे प्राण
सब कुछ किया तुम्हारे कारण, राजपद तुम करो स्वीकार 

शोक और संताप त्याग कर, धैर्य धर्म का अब लो आश्रय
है तुम्हारे ही अधीन अब,  नगर और यह निष्कंटक राज्य

विधि-विधान के ज्ञाता हैं जो, वसिष्ठ और ब्राह्मण के संग
कर अंतिम संस्कार पिता का, राज्याभिषेक कराओ अब


इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में बहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ.

Monday, February 5, 2018

भरत का कैकेयी द्वारा उनका श्रीराम के वनगमन के वृत्तांत से अवगत होना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्


द्विसप्ततितमः सर्गः

भरत का कैकेयी के भवन में जाकर उसे प्रणाम करना, उसके द्वारा पिताके परलोकवास का समाचार पा दुखी हो विलाप करना तथा श्रीराम के विषय में पूछने पर कैकेयी द्वारा उनका श्रीराम के वनगमन के वृत्तांत से अवगत होना 


सुनना चाहता हूँ उन्हें मैं, कहे वचन जो भी मेरे हित 
कैकेयी ने कहा सत्य तब, पूछ रहे जो बात भी भरत

हा राम ! कहा त्यागे प्राण, बुद्धिमानों में श्रेष्ठ पिता ने 
काल धर्म के वशीभूत हो, गज बंधा हो ज्यों पाशों से

अंतिम वचन यही थे उनके, वे ही मनुज कृतार्थ होंगे
लक्ष्मण, सीता सहित राम से, जो लौटेने पर मिलेंगे

अप्रिय बात सुनी दूजी जब, भरत और भी दुखी हो गये 
मुखड़े पर विषाद छा गया, पूछा पुनः यह प्रश्न माता से

कौसल्यानन्दन प्रिय राम, सीता सहित कहाँ चले गये
कैकेयी ने उन्हें बताया, समाचार यथोचित विधि से

वल्कल वस्त्र पहन कर राम, सीता संग गये दंडक वन
भाई के इस कृत्य का तब, लक्ष्मण ने भी किया अनुसरण

यह सुनकर भरत डर गये, शंका हुई भाई पर उन्हें
स्मरण कर महत्ता कुल की, कैकेयी से लगे पूछने

क्या किसी को मार दिया था, या हर लिया था धन ब्राह्मण का
परस्त्री पर नजर पड़ी क्या, राम को दंड मिला है किसका ?

तब चपल स्वभाव था जिसका, कैकेयी ने निज कृत्य कहा
व्यर्थ ही स्वयं को विदुषी माने, भर हर्ष में बतलाया 

Friday, February 2, 2018

भरत का पिताके परलोकवास का समाचार पा दुखी हो विलाप करना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्

द्विसप्ततितमः सर्गः

भरत का कैकेयी के भवन में जाकर उसे प्रणाम करना, उसके द्वारा पिताके परलोकवास का समाचार पा दुखी हो विलाप करना तथा श्रीराम के विषय में पूछने पर कैकेयी द्वारा उनका श्रीराम के वनगमन के वृत्तांत से अवगत होना


भरत गिरे थे साखू तन सम, काटा गया जिसे फरसे से
शोकाकुल पुत्र को उठाया, कैकेयी ने कहे वचन ये

उठो, नराधिप ! महायशस्वी, तुम ऐसे क्यों पड़े भूमि पर
तुम जैसे सम्मानित जन यूँ, नहीं हुआ करते शोकाकुल

प्रभा ज्यों निश्चल रवि मंडल में, सुस्थिर है मेधा तुम्हारी
दान, यज्ञों की अधिकारिणी, वेदों का अनुसरण कराती

भरत वसुधा पर रहे लोटते, व्याकुल रहे बहुत देर तक
पश्चात बोले माता से, हो अधिकाधिक शोक से आकुल

सोचा था मैंने, महाराज, श्रीराम को राज्य देंगे
बड़े हर्ष से की यात्रा, खुद यज्ञ अनुष्ठान करेंगे

किन्तु यहाँ आने पर बातें, आशा के विपरीत हो गयीं
फटा जा रहा अंतर मेरा, उनको आँखें नहीं देखतीं

कैसा उनको रोग हुआ था, गये पूर्व मेरे आने से
धन्य राम व अन्य भाई, किया अंतिम संस्कार जिन्होंने 

निश्चय ही पूज्य पिताजी को, नहीं ज्ञान मेरे आने का
झुका कर मस्तक शीघ्र सूँघते, बड़े प्यार से वह अन्यथा

अनायास शुभ कर्म जो करते, पिता का कोमल हाथ कहाँ 
धूल धूसरित तन पोछते, स्पर्श अतिसुखदायी था जिसका

अब जो भाई, पिता बन्धु हैं, जिनका परम प्रिय सेवक हूँ
कर्म महान सहज ही करते, श्रीराम को सूचित कर दो

धर्म के ज्ञाता पुरुष के हित, पिता समान है बड़ा भाई
चरणों में प्रणाम करूंगा, हैं आश्रय अब मेरे वे ही 

धर्म पालन सहज था जिनको, उत्तम व्रत का पालन करते
धर्मज्ञ वह  पिता पराक्रमी, अंतिम समय में क्या कह गये


Friday, December 29, 2017

भरत द्वारा पिताके परलोकवास का समाचार पा दुखी हो विलाप करना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्

द्विसप्ततितमः सर्गः

भरत का कैकेयी के भवन में जाकर उसे प्रणाम करना, उसके द्वारा पिताके परलोकवास का समाचार पा दुखी हो विलाप करना तथा श्रीराम के विषय में पूछने पर कैकेयी द्वारा उनका श्रीराम के वनगमन के वृत्तांत से अवगत होना

पितृगृह में न देखा पिता को, माता के घर गये भरत तब
देख पुत्र को भरी हर्ष से, खड़ी हो गयी वह आसन तज

श्रीहीन सा महल को पाया, जब उसमें प्रवेश था किया
माता के शुभ चरणों का फिर, झुककर भरत ने स्पर्श किया

मस्तक सूँघा, लगा हृदय से, निकट बिठा कर उनसे पूछा
बीतीं कितनी रात्रि मार्ग में, नाना गृह से निकले, बेटा !

अति शीघ्रता से तुम आये, क्या बहुत थकावट हुई तुम्हें
नाना, मामा सकुशल तो हैं, मुझे बताओ सारी बातें 

प्रिय वाणी में पूछा माँ ने, दिया जवाब दशरथ नंदन ने
 रात सातवीं बीती है यह, चला था जब नाना के घर से

कुशल से हैं नाना व मामा, विदा किया मुझे धन आदि दे
नहीं अभी तक पहुँचे हैं वे, वाहन थके भार से उनके

दूतों ने मचायी जल्दी, राजकीय संदेश जो लाये
पहले ही चला आया हूँ मैं, इसीलिए शीघ्रता करके

अच्छा माँ ! अब जो मैं पूछूँ, उत्तर दो शीघ्र तुम उसका
हर्षित नहीं हैं क्यों परिजन, सूना क्यों है पलंग तुम्हारा

जिनके दर्शन की इच्छा है, पिता कहाँ हैं, मुझे बताओ
उनके चरण मुझे छूने हैं, क्या माँ कौसल्या के घर हैं ?

घोर अप्रिय इस समाचार को, प्रिय समझ कर लगी बताने
राज्य लोभ से अति मोहित थी, कैकेयी बोली भरत से  

 महात्मा थे पिता तुम्हारे, आश्रयदाता भी सत्पुरुषों के
इक दिन जो गति होती सबकी, उसी गति को प्राप्त हुए वे  

धार्मिक कुल में भरत जन्मे थे, शुद्ध अति हृदय था उनका
पितृ शोक से गिरे भूमि पर, माता की सुन बात वह सहसा

‘मारा गया मैं’, दीन वचन यह, कहने लगे हो दुःख से आतुर  
महापराक्रमी लगे लोटने, पटक बाजुओं को धरती पर

हुई भ्रांत चेतना उनकी, चित्त हुआ अति व्याकुल दुःख से
दुःख से भरे वचन बोलते, कर स्मरण विलाप करते थे

सुशोभित होती थी यह शय्या, शरद काल के निर्मल नभ सी
  बिना चन्द्रमा के गगन ज्यों, श्री हीन है शुष्क सिंधु सी

सुंदर मुख वस्त्र में ढककर, कंठस्वर संग अश्रु गिराकर
गिर भू पर विलाप करते थे, मन ही मन अति पीड़ित होकर